Monday, 5 June 2017

एकाग्रता की शक्ति को कैसे बढ़ाये ..........???

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

🕉🙏*ENJOY HOW TO INCREASE  POWERS OF CONCENTRATION 💥☝🏾*🙏🕉💐🌺🎄🍀🌻🌼🌞

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*۩  चाहे आप कहीं भी कोई भी काम कर रहे हों, हर जगह ध्यान भटकाने वाली चीजें होती हैं। इसलिए काम पर एकाग्र होना एक मुश्किल काम है। मनुष्य का मस्तिष्क ऐसा नहीं है कि वह आसपास होने वाले कोलाहल को नजरअंदाज कर सके। माहौल में जरा सी भी हलचल ध्यान भटकाने के लिए काफी होती है।एकाग्रता को बढ़ाने के लिए ढृढ़ता बेहद जरूरी हैं।*

*۩  जीवन में एकाग्रता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इसके इलावा हर क्षेत्र जैसे बिज़नस, जॉब, लौकिक पढ़ाई आदि। किसी भी कार्य में सफलता का आधार एकाग्रता होती है। एकाग्रता वास्तव में एक बहुत बड़ी *तपस्या* *है, यह *निरंतर अभ्यास* *से हासिल होती है। मन को एकाग्र करने के कुछ अनुभव में से *टिप्स* *इस प्रकार हैं ―*

۩  मन और बुद्धि का एक होकर कार्य में साथ देना। जितना मन-बुद्धि साथ होंगे उतनी एकाग्रता बढ़ेगी।

۩  *माहौल का करें चुनाव*
आप जिस माहौल में काम करते हैं, वह एकाग्रता को बढ़ाने में काफी महत्वपूर्ण होता है। आरामदायक और आकर्षक माहौल में काम करते समय पूरी तरह से एकाग्रता हासिल की जा सकती है।

۩  *विचारों को नियंत्रित करें*
अपने दिमाग में अनौपचारिक विचार न आने दें। इससे बेवजह ही आपकी एकाग्रता भंग होगी। जब भी मन में काम से अलग विचार आए तो उस पर ध्यान न दें और आप जो काम कर रहे हैं उन पर पूरी तरह से केंद्रित हो जाएं।

۩  *टाइम प्लान बनाएं*
आपको जो काम करना है उसकी सूची बना लें। इसमें संतुलन के जरूरी है कि गंभीर काम को पर्याप्त समय दें।

۩  *नकारात्मक न सोचें*
मन में ऐसे विचार न आने दें कि आप खुद को एकाग्र नहीं कर सकते। इससे दिमाग को यह संदेश जाएगा कि आपमें एकाग्रता की कमी है। ऐसे में काम पर ध्यान केंद्रित करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

۩  *मल्टी-टास्किंग से बचें*
मल्टी-टास्किंग में कभी भी एकाग्रता हासिल नहीं की जा सकती। जब आपके सामने काम का अंबार होगा तो आप जो काम कर रहें हैं, उस पर ध्यान नहीं लगा पाएंगे।

۩  *लक्ष्य पर फ़ोकस करें*
जो लक्ष्य जीवन में लेकर चले उस पर सम्पूर्ण रूप से ध्यान दे। जो बात बीत गई उसे छोड दे।अपना प्रेजेंट (PRESENT) अच्छे से अच्छा करे।व्यर्थ देखने का सुख हमें एकाग्र होने नही देता।

۩  *शोर शराबा न हो*
ये काफी महत्वपूर्ण है कि आप जहाँ काम कर रहे हैं वहाँ ज्यादा शोर शराबा न हो। इससे आप काम पर ध्यान केंद्रित कर सकते है।

۩  *आहार और व्यायाम*
एकाग्रता हासिल करने में संतुलित आहार और व्यायाम की भी अहम भूमिका होती है। जरूरी पोषक तत्व के अभाव से आप में थकान और आलस्य आ सकता है। इसलिए विटामिन ई से भरपूर बादाम और फला को अपने आहार में शामिल करें। साथ ही रूटीन के तहत व्यायाम भी करें।

۩  *काम को समझें*
अगर आप को यह अच्छी तरह से मालूम न हो कि आपको करना क्या है, तो ऐसे में काम के प्रति एकाग्र होना और भी मुश्किल हो जाता है।

۩  *टाल-मटोल न करें*
टाल-मटोल की आदत कभी न डालें। यह एकाग्रता पर गहरा असर डालता है। जबतक कि आप बोझिल कामों को निपटा न लें, अपनी सीट से न उठें।

۩  *सकारात्मक रहें*
जब भी आपको काम पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत हो तो हमेशा अपने आप से बार-बार कहें कि आप ध्यान लगा सकते हैं। यह आपके अंदर एकाग्रता बढ़ाने में मददगार साबित होगा।

۩  *काम को बांटे*
जिस काम का कोई स्पष्ट आरंभ और अंत न हो वह आपके ध्यान को भटका सकता है। अगर आपके पास कोई बहुत बड़ा प्रोजेक्ट हो तो एक रास्ते का चयन करें, जिससे आप उस काम को शुरू कर सकें।

۩  एकाग्रता मतलब किसी चीज़ को लेकर हमारा फोकस।जो एकाग्रता में रहते है उनके संकल्पों में बहुत बल होता है।

۩  *अनुशासन*
अपने आप को अनुशासन में रखना काफी जरूरी होता है। साथ ही प्रभावी काम के लिए जरूरी है कि आप उसमें ज्यादा समय दें। इसलिए छोटे काम से शुरुआत करें और अगर आप आसानी से ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं, तो काम को पूरा समय दें।

۩  *अच्छी नींद लें*
अपने सोने का समय सुनिश्चित करें। अगर आप अच्छी नींद नहीं ले रहे हैं तो आप पर थकावट और आलस्य हावी रहेगा। ऐसे में आप किसी भी काम पर ध्यान नहीं लगा पाएंगे।

۩  *जरूरी चीजों की व्यवस्था करें*
इस बात को सुनिश्चित करें कि काम करने से पहले आपने उसके लिए जरूरी चीजों की व्यवस्था कर ली है। इससे अनावश्यक भटकाव नहीं होगा और आप स्थिर होकर काम कर पाएंगे।

۩  इसके इलावा एकाग्रता के अभ्यास के लिए छोटी छोटी चीज़ें फॉलो करना जैसे अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करना, अपने मन की चेकिंग करना, अपने दिल की धड़कन की सुनना आदि।

۩ ۩  *अव्यक्त बापदादा* ۩ ۩

*۩  जहाँ एकाग्रता होगी, वहाँ संकल्प, बोल और कर्म का व्यर्थपन समाप्त हो जाता है और समर्थपन आ जाता है । समर्थ होने के कारण सब में सिद्धि हो जाती है। (28-12-1979)*

۩  *साइंस का महत्व क्यों है?*
*प्रयोग में आती है तब सब समझते है, हाँ, साइंस अच्छा काम करती है तो साइलेंस की पॉवर का प्रयोग करने के लिए एकाग्रता की शक्ति चाहिए और एकाग्रता का मूल आधार है- मन की कंट्रोलिंग पॉवर, जिससे मनोबल बढ़ता है । मनोबल की बड़ी महिमा है, यह रिद्धि सिद्धि वाले भी मनोबल द्वारा अल्पकाल के चमत्कार दिखाते है । आप तो विधिपूर्वक, रिद्धि सिद्धि नहीं, विधिपूर्वक कल्याण के चमत्कार दिखाएंगे जो वरदान हो जायेंगे; आत्माओं के लिए यह संकल्प शक्ति का प्रयोग वरदान सिद्ध हो जायेगा । (15-12-1999)*

۩  एकाग्रता बढ़ाने के लिए मन में श्रेष्ठ विचारो का होना अति आवश्यक हैं।बुद्धि को शुद्ध करे।
नीचे दिये गए स्वमान का अभ्यास करें।रात को सोने से पहले 108 बार 21 दिन तक लिखें:

👉 मैं एकाग्रचित्त आत्मा हूँ
👉मैं एक महान आत्मा हूँ।
👉मैं परम पवित्र आत्मा हूँ।

           संकल्प करें......मैं मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ....मेरे पास सभी शक्तिया हैं...मेरे पास एकाग्रता की शक्ति भी है।

۩  परमात्मा जो सर्वशक्तियों का सागर हैं, दाता हैं उसे जाने और उससे अपना CONNECTION जोड़े।धीरे 2 उसकी शक्तिया आपके अंदर आने लगेंगे और आपका मन शांत होता जायेगा। एकाग्रता बढ़ती जायेगी।और मानसिक डिस्टर्बेंस धीरे-धीरे समाप्त होता जाएगा।

*۩ व्यर्थ देखना जैसे टीवी इंटरनेट कुदृष्टि आदि, व्यर्थ सुनना, व्यर्थ बोलना, व्यर्थ व अनावश्यक सोचना आदि पर नियंत्रण करने से 90% तक एकाग्रता को बढाया जा सकता है।*

  🕉  👏👏ओम शांति🙏🙏🕉
🌿🍇🥀🌲🎄💐🍁🌺🌷🌸🌴🍂🌞🌼🌻🌳🍀🎄

Saturday, 3 June 2017

बीजेपी के एक नेता हैं सुब्रमण्यम स्वामी..........

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....



इन्हें आक्रोश में बोलते हुए बहुत कम सुना हूँ...यूँ कहें कि शांत चित्त होकर , चेहरे पर मुस्कान लिए , बड़े ही धीरज के साथ जब विरोधियों की बखिया उधेड़ते हैं तब बीजेपी समर्थक तो खूब तालियाँ बजाते हैं...परंतु इनकी बातें विरोधी खेमों खासकर काँग्रेसी समर्थकों के दिलों को छलनी कर जाती हैं , उनके मुखमंडल की आभा को मलीन कर देती हैं।

मुद्दे छोटे हों या बड़े...बेबाक एवं तर्कसंगत दलील देने वाले एवं "#वन_मैन_आर्मी" कहलाने वाले स्वामी की बीजेपी में क्या हैसियत है...ये बात तो पार्टी के अंदर के लोग भी नहीं जानते हैं... पर पार्टी के लिए एक सकारात्मक माहौल जरूर बनाते हैं।।।

पर एक बात जरूर जान लें , सोनिया एवं राहुल की हैसियत और इमेज को काफी हद तक मटियामेट करने में इनका बड़ा हाथ है।

हिन्दुत्व एवं राम मंदिर के मुद्दों पर बेबाक राय रखने वाले स्वामी की डायरी में कई धुरंधर काँग्रेसी नेताओं के काले कारनामें दर्ज हैं, ऐसा इनका कहना है।।

स्वामी की बात यदि मानी जाए तो इनके पास ऐसे सबूत एवं तथ्य हैं कि सोनिया , राहुल , चिदंबरम सरीखे नेताओं पर " #देशद्रोह " का आरोप साबित कर इन्हें जेल की सलाखों में डाला जा सकता है।

देशद्रोह का आरोप ?
...........जी हाँ बिल्कुल!!

और यदि आप भी इसके पीछे की सच्चाई सुनेंगे तो आपका दिमाग भी चक्कर खा जाएगा!

बात 2009 की है ,
देश की सुरक्षा एजेंसियों को पता लगा कि भारत- नेपाल के सीमावर्ती जिलों में भारी मात्रा में नकली नोटों को चलाया जा रहा है , यही नहीं इन्हीं नोटों के जरिए बैंकों में जमा-निकासी का काम भी निर्बाध रूप से चल रहा है।

फिर क्या था..?
..मार दिया गया छापा उन जिलों के 70 बैंकों पर!
सीबीआई के अधिकारी उस वक्त हैरत में पड़ गए जब उन बैंकों के मैनेजर्स ने साफ शब्दों में कहा कि ये रुपए तो उन्हें रिजर्व बैंक से मिले हैं।

उसके बाद सीबीआई ने जब रिजर्व बैंक के तहखानों में छापेमारी की तो असली की तरह दिखने वाले नकली नोटों का बड़ा जखीरा मिला...उनकी तो आँखें फटी रह गई थी!!

दरअसल ये नकली नोट ठीक वैसे ही थे जैसे नोट पाकिस्तानी आईएसआई एजेंसी तस्करी केे जरिए भारत में पहुँचाती थी।
भारतीय नोटों के ऊपर जो सुरक्षा मानक थे उससे बिल्कुल मिलते-जुलते नोटों को रिजर्व बैंक भी पकड़ नहीं पाया यह आश्चर्य की बात थी!!

अब प्रश्न यह उठता है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकली नोट भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानों में कब से आ रहे थे ?
कौन थे छापने वाले ??
इसके तह में जाने की जरूरत थी ...जाँच की तत्काल आवश्यकता थी।

तो 2010 में एक संसदीय समीति बनी जो सरकारी उपक्रमों संबंधी जाँच करती है जिसे COPU ( committee on public undertaking) कहते हैं।

अब इस कमेटी में कौन कौन थे ?
क्या जाँच हुई ?
किसे रिपोर्ट दी गई ?
नतीजा क्या निकला ?
कार्रवाई क्या हुई..?
किस पर गाज गिरी...??
...ये सारी बातें सोनिया-मनमोहन की सरकार एवं उनके मंत्रियों के अनेको काले कारनामों की अँधेर गलियों में कहीं खो सी गईं!!

या फिर यह भी संभव है कि जो बातें बताई जाने लायक समझी गई होगी सिर्फ वही बताई गई जिसके आधार पर कार्रवाई की गई थी।।

वैसे भी मनमोहन सिंह zero loss
(कोयला घोटाला याद करें) की रट लगाने वाले और नोटबंदी को राष्ट्रीय आपदा कहने वाले अर्थशास्त्री एवं प्रधानमंत्री हों...,
या
नोट बंदी को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताने वाले वित्त मंत्री चिदंबरम हों...,,
या
ईस्ट इंडिया कंपनी की तर्ज पर भारत पर शासन करने वाली सोनिया गाँधी हों...,,
इनसे और ज्यादा की क्या उम्मीद की जा सकती थी???

अब चलते हैं जरा फ्लैश बैक में....

1996 - 97 में देवगौड़ा की सरकार में चिदंबरम वित्त मंत्री बने थे...,
इन्होंने प्रधानमंत्री देवगौड़ा के बिना जानकारी में लाए इंग्लैंड की एक बड़ी और नामचीन मुद्रण कंपनी को भारतीय करेंसी छापने का ठेका दे दिया...,,
वह कंपनी पाकिस्तान सहित विश्व के अनेक देशों की मुद्रा छापा करती थी।।

अब जैसा कि सभी जानते हैं पाकिस्तान की हुकूमत सेना और आईएसआई के हाथों में होती है...,
तो...येन केन प्रकारेण उस विदेशी मुद्रण कंपनी से या उसके कर्मचारियों से साठ-गाँठ करके भारतीय करेंसी में उपयोग होने वाले पेपर , इंक , सुरक्षा धागा , डिजाइन या अन्य चीजें आईएसआई को आसानी से हासिल हो गई थी।
अब पाकिस्तान में धड़ल्ले से भारतीय नोट छपते रहे और तस्करी के जरिए भारत में पहुँचते रहे!!
भारतीय तंत्र इसे पकड़ने में नाकाम रहा और एक दशक के अंदर असली की तरह दिखने वाले नकली नोटों से भारतीय बाजार पट गए!!
भारतीय अर्थशास्त्रीयों को अर्थशास्त्र का अर्थ समझाने में पाकिस्तान सफल हो गया था।।

कहते हैं कि "अति सर्वत्र वर्जयेत !"
.....तो 2009 में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने इस खेल का भंडाफोड़ कर दिया!!
इस मामले की जाँच करने के लिए बनाई गई समिति COPU की रिपोर्ट के आधार पर उस विदेशी मुद्रण कंपनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया।।

ध्यान रहे कि चिदंबरम साहब यूपीए के दोनों टर्म में भी देश के वित्त मंत्री और सोनिया गाँधी के करीबी रहे थे।
अपने बेटे को बहुत कम उम्र में ही दलाली के बिजनेस में स्थापित करवाकर हजारों करोड़ का मालिक बनवाने वाले पी चिदंबरम आजकल हिन्दी एवं अंग्रेजी के अखबारों में मोदी के तीन सालों की कमियाँ गिनाते नहीं थक रहे हैं।।
हालाँकि सुब्रमण्यम स्वामी ने इस नकली नोट के खेल में चिदंबरम और माँ-बेटे की भूमिका का जिक्र पहले भी किया था पर बात कुछ बनी नहीं थी।।

अब मोदी सरकार स्वामी की बातों पर गौर करते हुए चिदंबरम की पंद्रह सालों की कुंडली खँगालने का काम शुरू करवा दिया है।।

अब तो आने वाला समय ही बताएगा कि नकली नोटों के इस गोरखधंधे में केवल चिदंबरम शामिल था या माँ-बेटा भी...??
क्योंकि पार्टी की देशभक्ति और पाकिस्तान प्रेम जग जाहिर है ।

नोटबंदी का फैसला मोदी ने यूँ ही नहीं लिया था।
अब तो जरूरत है देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाली काँग्रेसी कड़ी को तलाश करके इन traitors को देशद्रोह के ज़ुर्म में सलाखों के अंदर किया जाए ।।

संजय दुबे

Friday, 2 June 2017

*आँख फाड़ देने वाला सच, पढ़ कर आप भी आश्चर्य चकित रह जायेंगे ......???*

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

      भारतवर्ष में कुल 4120स•वि•स•(MLA) और 462स•वि•प•(MLC) हैं,अर्थात कुल 4,582 विधायक। प्रति विधायक वेतन भत्ता मिला कर *प्रति माह ₹2 लाख* का खर्च होता है। *अर्थात ₹91 करोड़ 64 लाख रुपया प्रति माह*। इस हिसाब से *प्रति वर्ष लगभ ₹1100 करोड़*।
साथ ही लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 776 सांसद(MP) हैं। इन सांसदों को वेतन भत्ता मिला कर *प्रति माह ₹5 लाख* दिया जाता है। अर्थात कुल सांसदों का वेतन *प्रति माह ₹38 करोड़ 80 लाख है*। और *हर वर्ष इन सांसदों को ₹465 करोड़ 60 लाख* वेतन भत्ता में दिया जाता है।
●अर्थात भारत के विधायकों और सांसदों के पीछे *भारत का प्रति वर्ष ₹15 अरब 65 करोड़ 60 लाख खर्च होता है*।
●ये तो सिर्फ इनके मूल वेतन भत्ते की बात हुई। इनके आवास, रहने, खाने, यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर सपाटा आदि का खर्च भी लगभग इतना ही है। अर्थात् *लगभग ₹30 अरब खर्च होता है इन विधायकों और सांसदों पर*।
●अब गौर कीजिए इनकी सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों के वेतन पर। एक विधायक  को दो बॉडीगार्ड और एक सेक्शन हाउस गार्ड यानी कम से कम 5 पुलिसकर्मी और यानी कुल 7 पुलिसकर्मी की सुरक्षा मिलती है। 7 पुलिस का वेतन लगभग (₹25,000 प्रति माह की दर से) ₹1 लाख ₹75 हजार होता है। इस हिसाब से 4582 *विधायकों की सुरक्षा का सालाना खर्च ₹9 अरब 62 करोड़ 22 लाख प्रति वर्ष है*।
 इसी प्रकार *सांसदों की सुरक्षा पर प्रति वर्ष ₹164 करोड़ खर्च होते हैं*। Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त नेता, मंत्रियों,  मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए लगभग 16000 जवान अलग से तैनात हैं। जिनपर *सालाना कुल खर्च लगभग ₹776 करोड़ बैठता है*। इस प्रकार सत्तासीन नेताओं की *सुरक्षा पर हर वर्ष लगभग ₹20 अरब खर्च होते हैं*।
●अर्थात हर वर्ष *नेताओं पर कम से कम 50 अरब रूपये खर्च होते हैं। ●इन खर्चों में राज्यपाल, भूतपूर्व नेताओं को पेंशन, पार्टी के नेता, पार्टी अध्यक्ष, उनकी सुरक्षा आदि का खर्च शामिल नहीं है। यदि उसे भी जोड़ा जाए तो कुल खर्च लगभग 100 अरब रुपया हो जायेगा।*
अब सोचिये हम प्रति वर्ष नेताओं पर ₹100 अरब से भी अधिक खर्च करते हैं, बदले में गरीब लोगों को क्या मिलता है ?
*क्या यही है लोकतंत्र ?* प्रत्येक भारतवासी को जागरूक होना ही पड़ेगा और इस फिज़ूल ख़र्ची के खिलाफ बोलना पड़ेगा ? *इस मैसेज को जितना हो सके दूसरे ग्रुप में फॉरवर्ड कर अपनी जागरूकता का परिचय दें।*
    🙏सादर निवेदन 🙏

वेश्या को हम पापी कहते हैं। और वेश्या आ जाए तो हमारे मन में तत्क्षण निंदा आ जाती है। लेकिन सैनिक को...सैनिक क्या कर रहा है ? सैनिक भी शरीर बेच रहा है रोटी के लिए..........

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

वेश्या को हम पापी कहते हैं। और वेश्या आ जाए तो हमारे मन में तत्क्षण निंदा आ जाती है। लेकिन सैनिक को...सैनिक क्या कर रहा है? सैनिक भी शरीर बेच रहा है रोटी के लिए।
       
   सैनिक को हम तैयार इस तरह करते हैं कि उसमें कोई मानवीय गुण न रह जाए। सैनिक का सारा प्रशिक्षण ऐसा है कि उसके भीतर मस्तिष्क न रह जाए, हृदय न रह जाए; वह यंत्र हो जाए। इसलिए हम सालों तक उससे कोई और काम नहीं लेते। हम क्या करवाते हैं? हम उसको लेफ्ट-राइट परेड करवाते रहते हैं। घंटों--बाएं घूमो, दाएं घूमो; बाएं घूमो, दाएंघूमो; बायां पैर ऊंचा करो, दायां नीचा करो! हम क्या करवा रहे हैं उससे? वर्षों तक हम उससे यह क्यों करवा रहे हैं?

इसके पीछे एक पूरा मनोविज्ञान है। क्योंकि जो आदमी वर्षों तक बाएं घूमो, दाएं घूमो करता रहेगा, वह धीरे-धीरे कंडीशंड हो जाएगा। आज्ञा, और उसके भीतर कोई विचार नहीं उठेगा, कृत्य। आज्ञा और कृत्य के भीतर विचार नहीं होगा। बाएं घूमो! तो सैनिक सोचता नहीं कि मैं घूमूं या न घूमूं? या कि घूमने का कोई लाभ है? या क्यों व्यर्थ घुमा रहे हो? न, इस सबकी सुविधा उसे नहीं है। उसे सिर्फ घूमना है। तो जब उससे कहा जाता है: गोली चलाओ! तो वह चलाता है। तब वह सोच नहीं सकता कि मैं क्यों चलाऊं? या सामने जिसे मैं मार रहा हूं, उसे मारना जायज है? या मैं कौन हूं जो उसेमारूं? और मैं क्या पा रहा हूं मार कर?

कोई सौ रुपए, दो सौ रुपए की महीने की नौकरी पा रहा है एक सैनिक। अपनी रोटी के लिए वह हत्या का धंधा कर रहा है। वह हजार लोगों को काट सकता है। जिस आदमी ने हिरोशिमा पर एटम गिराया, उससे बाद में जब पूछा गया, तो उसने कहा कि मैंने तो सिर्फ आज्ञा का पालन किया, मेरा और कोई जिम्मा नहीं है। जब उस आदमी से पूछा गया कि तुम रात सो सके हिरोशिमा पर एटम गिरा कर? तो उसने कहा, मैं बिलकुल आनंद से सोया, क्योंकि मैं अपना काम पूरा कर आया था। डयूटी पूरी हो गई थी, फिर मैं सो गया।

वहां एक लाख बीस हजार आदमी जल कर राख हो गए--इस आदमी के गिराने से। अगर यह आदमी सोचे कि मैं पा क्या रहा हूं--तीन सौ रुपए महीना, कि पांच सौ रुपए महीना--कि मैं रोटी ही तो कमा रहा हूं, रोटी तो भिखमंगे भी सड़क पर भीख मांग कर कमा लेते हैं, तो मैं एक लाख बीस हजार आदमियों की हत्या करने का रोटी कमाने के लिए कारण बनूं? तो शायद यह आदमी कहे कि नहीं, यह आज्ञा मानने से मैं इनकार करता हूं। लेकिन यह मौका नहीं आएगा। अगर हम किसी आदमी को सीधा एटम बम गिराने भेज दें तो आएगा। इसलिए वर्षों हम इसको लेफ्ट-राइट कराते हैं, इसके सोचने की क्षमता को मारते हैं, इसके भीतर बुद्धि को क्षीण करते हैं। यह यंत्रवत हो जाता है।

विलियम जेम्स मजाक में कहा करता था कि एक दिन ऐसा हुआ कि वह एक होटल में बैठ कर अपने मित्रों से कुछ बात कर रहा था। बड़ा मनोवैज्ञानिक था अमरीका का और वह कह रहा था कि आदमी कैसे संस्कारित, कंडीशंड हो जाता है। और तभी एक रिटायर्ड सैनिक सड़क से गुजर रहा था अंडे अपने सिर पर लिए। और विलियम जेम्स ने एक जिंदा उदाहरण देने के लिए चिल्ला कर कहा, अटेंशन! सावधान!

वह आदमी, जो कि रिटायर्ड था कोई दस साल से,उसकी अंडे की टोकरी नीचे गिर गई और वह अटेंशन खड़ा हो गया। जब वह खड़ा हो गया, तब उसे समझ में आया कि अरे! बहुत नाराज हुआ और उसने कहा, क्या मजाक करते हैं, सब अंडे फूट गए।

पर विलियम जेम्स ने कहा कि तुम्हें हक था, तुम अटेंशन न करते। पर उसने कहा कि वह हक तो हम खो चुके। दस साल हो गए छोड़े हुए नौकरी, लेकिन यंत्रवत। तुमने कहा तो सोचने का मौका ही नहीं रहा कि...। नहीं करने का सवाल ही नहीं उठता। और हमने किया, यह कहना ठीक नहीं है; अटेंशन हो गया--यंत्रवत।

तो सैनिक की तैयारी है यंत्रवत।

मनुष्य का जो सर्वाधिक पतन हो सकता है, वह यंत्र है। पशु मनुष्य का पतन नहीं है, बड़ा पतन नहीं है। आदमी दो सीढ़ियां नीचे गिर सकता है; आदमी चाहे तो पशु हो सकता है। लेकिन पशु की भी एक गरिमा है। क्योंकि पशु भी सोचता तो है थोड़ा; पशु भी अनुभव तो करता है थोड़ा; पशु भी निर्णय तो लेता है कभी। आपका कुत्ता है; उसे भूख भी लगी हो, लेकिन आप बेमन से दुतकार कर रोटी डाल दें, तो वह भी रोटी खाने को तैयार नहीं होगा। वह जो दुतकारा है, वह दीवार बन गया। वह तैयार नहीं होगा। वह भी कुछ अनुभव करता है, कुछ सोचता है, कुछ निर्णय लेता है। उससे भी बड़ा पतन है यंत्रवत हो जाना। तब कोई निर्णय का सवाल ही नहीं रहता।

इसलिए लाओत्से कहता है, सैनिक अनिष्ट का साधन है। क्योंकि वह मनुष्य की अधिकतम पतन की अवस्था है। यह तो बड़ी बुरी बात लाओत्से कह रहा है। क्योंकि फिर क्या होगा हमारे सेनापतियों का? हमारे नेपोलियन, हमारे सिकंदर, हमारा सारा इतिहास तो सैनिकों का इतिहास है। इतिहास में जो चमकदार नाम हैं, वे सैनिकों के नाम हैं।

लेकिन हमारा सारा इतिहास हिंसा का इतिहास है। और हमारा सारा इतिहास आदमियत का नहीं है; हमारा सारा इतिहास, आदमी अभी भी पशु है, इस बात का इतिहास है। स्वभावतः, उसमें सैनिक श्रेष्ठ मालूम पड़ता है। उसमें सैनिक के तगमे चमकते हैं। उसकी बांहों पर लगी रंगीन पट्टियां इंद्रधनुष बन जाती हैं--पूरे इतिहास पर।

लाओत्से कहता है, सैनिक अनिष्ट के औजार हैं; क्योंकि व्यवसायी हिंसक हैं वे। इससे तो गैर-व्यवसायी हिंसक भी ठीक हैं। अगर कोई आदमी आपका अपमान करे और आप क्रोध से भर जाएं, तो इस क्रोध में भी एक गरिमा है। लेकिन व्यवसायी हिंसक क्रोध से भी नहीं भरता और हत्या करता है। सैनिक को क्रोध का कोई कारण नहीं है। वह सिर्फ धंधे में है, वह अपना काम कर रहा है।

सैनिक और वेश्या में बड़ी निकटता है। वेश्या शरीर को दे देती है बिना किसी भाव के। कोई प्रेम नहीं है, कोई घृणा नहीं है; बड़ी तटस्थता है। इसीलिए तो पैसे पर शरीर को बेचा जा सकता है। वेश्या को हम सब पापी कहते हैं। लेकिन वेश्या का कसूर क्या है? कि वह अपने शरीर को पैसे पर बेच रही है,यही कसूर है न! सैनिक क्या कर रहा है? वह भी अपने शरीर को पैसे पर बेच रहा है। और अगर दोनों में चुनना हो तो वेश्या बेहतर है। क्योंकि वेश्या सिर्फ अपने शरीर को बेच रही है, किसी दूसरे के शरीर की हत्या नहीं कर रही। सैनिक अपने शरीर को बेच रहा है दूसरे की हत्या करने के लिए। लेकिन वेश्या अपमानित है और सैनिक सम्मानित है। वेश्या से किसी को क्या बड़ा नुकसान पहुंचा है?

विचारशील लोग कहते हैं कि वेश्याओं के कारण बहुत से परिवार बचे हैं;  नुकसान तो किसी को पहुंचा नहीं। असल में, वेश्याएं न हों, तो सतियों का होना बहुत मुश्किल हो जाए। वहां वेश्या है, तो घर में पत्नी सती बनी रहती है। और पत्नी भी बहुत डरती नहीं पुरुष के वेश्या के पास जाने से;पत्नी डरती है पड़ोसिन के पास जाने से। क्यों? क्योंकि वेश्या से कोई खतरा नहीं है; क्योंकि कोई लगाव नहीं है, कोईइनवाल्वमेंट नहीं है। पुरुष जाएगा और आ जाएगा। वेश्या के पास जाना एक बिलकुल तटस्थ प्रक्रिया है। वह पैसे का ही संबंध है। लेकिन पड़ोसिन के पास अगर पुरुष चला जाएगा तो लौटना फिर आसान नहीं है। क्योंकि पैसे का संबंध नहीं है;भाव का संबंध बन जाएगा।

इसलिए वेश्याओं से किसी को कोई चिंता नहीं है। पुराने राजा-महाराजाओं की औरतें पास में बैठ कर, और वेश्याओं को राजा नचाता रहता, और वे भी देखती रहतीं। उससे कोई अड़चन न थी। क्योंकि उससे सती होने में कोई बाधा नहीं पड़ती। बल्कि जो लोग समाज की गहराई में खोज करते हैं, वे कहते हैं, उससे सुविधा बनती है। सुविधा यह बनती है कि समाज व्यवस्थित चलता जाता है। कुछ स्त्रियों के शरीर बिकते रहते हैं; समाज का घाव सब तरफ नहीं फूटता, कुछ स्त्रियां उस घाव को अपने ऊपर ले लेती हैं। वह जो बीमारी सब तरफ फैल जाती, वह सब तरफ नहीं फैलती; उसकी धाराएं बन जाती हैं।

जैसे हमारे घर का गंदा पानी नालियों से बह जाता है। तो नालियां आपके घर की सफाई के लिए जरूरी हैं; नहीं तो पूरी सड़कों पर पानी फैल जाएगा। वे वेश्याएं नालियों का काम कर जाती हैं। और जो गंदगी घर-घर में इकट्ठी होती है, वह वहां से बह जाती है। जब तक घर में गंदगी होती है, तब तक वेश्या रहेगी। जिस दिन घर का संबंध ही पति और पत्नी का प्रेम का गहन संबंध हो जाएगा, कोई गंदगी पैदा न होगी, तभी वेश्या मिटेगी। नहीं तो वेश्या मिटाई नहीं जा सकती। क्योंकि वह जरूरत है।

लेकिन वेश्या को हम पापी कहते हैं। और वेश्या आ जाए तो हमारे मन में तत्क्षण निंदा आ जाती है। लेकिन सैनिक को...सैनिक क्या कर रहा है? सैनिक भी शरीर बेच रहा है रोटी के लिए, और साथ में दूसरे के शरीरों की भी हत्या कर रहा है।

लाओत्से कहता है, "सैनिक अनिष्ट के औजार होते हैं। और लोग उनसे घृणा करते हैं।'

लेकिन इसे थोड़ा हम समझ लें, कि लोग साधारणतः सैनिक से घृणा करते हैं; साधारणतः पुलिसवाले को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता। जब तक आप सुरक्षित हैं और शांत हैं और जिंदगी में कोई तकलीफ नहीं, तो पुलिस को और सैनिक को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता। लेकिन जैसे ही तकलीफ होती है, वैसे ही पुलिस ही आपका रक्षक हो जाता है। जैसे ही बेचैनी फैलती है, युद्ध की आशंका होती है, सैनिक ही आपका सब कुछ हो जाता है। इसलिए सैनिक सदा उत्सुक रहते हैं कि युद्ध चलता रहे। और पुलिसवाला भी सदा उत्सुक रहता है कि कुछ उपद्रव होता रहे। क्योंकि जब उपद्रव होता है,तभी वह सम्मानित है। जैसे ही उपद्रव खोया, वह खो जाता है।

अभी आपने देखा, हिंदुस्तान-पाकिस्तान का थोड़े दिन युद्ध हुआ, तो सेनापतियों के नाम अखबारों में सुर्खियांबन गए। धीरे-धीरे अब कम होते जा रहे हैं वे नाम, लेकिन अभी भी चल रहे हैं। साल, छह महीने कोई उपद्रव न हुआ,आप भूल जाएंगे कि कौन है सेनापति।

सैनिक की प्रतिष्ठा तभी है, जब उपद्रव चल रहा हो; अन्यथा लोग घृणा करते हैं। क्योंकि लोग भी भीतर अनुभव तो करते हैं कि यह हिंसा का व्यवसाय, यह हत्या का धंधा, सब तरह से गलत है। फिर भी कभी-कभी हम इसे ठीक मानते हैं। अगर एक आदमी किसी की हत्या कर दे तो वह अपराधी है और फांसी की सजा होती है। और एक आदमी युद्ध में हजारों की हत्या कर दे तो सम्मानित होता है। मरने की बात तो एक ही है; मारने की बात तो एक ही है। लेकिन कभी वही अपराध है, और कभी वही सम्मान बन जाता है। तो गहरे में तो हम जानते हैं कि सैनिक कोई शुभ लक्षण नहीं है।

इसलिए लाओत्से कहता है, "और लोग उनसे घृणा करते हैं। ताओ से युक्त धार्मिक पुरुष उनसे बचता है।'

हमने सुना है कि धार्मिक पुरुष वेश्या से बचता है। लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि धार्मिक पुरुष सैनिक से बचता है? नहीं, आपके खयाल में नहीं होगा। लेकिन लाओत्से ठीक कह रहा है। वेश्या से भी ज्यादा सैनिक से बचना जरूरी है धार्मिक पुरुष का। क्योंकि सैनिक का प्रयोजन ही एक है कि आदमी अभी आदमी नहीं हुआ, इसलिए उसकी जरूरत है। वह सबूत है हमारे पशु होने का।

आपके लिए जेल की जरूरत है, सिपाही की जरूरत है, अदालत की जरूरत है, मजिस्ट्रेट की जरूरत है। ये सब प्रतीक हैं हमारे चोर-बेईमान होने के। मजिस्ट्रेट अकड़ कर अपनी कुर्सियों पर बैठे हुए हैं; वे हमारी बेईमानी के प्रतीक हैं। उनकी कोई जरूरत नहीं है, जिस दिन हम बेईमान नहीं हैं। सैनिक खड़ा है चौरस्ते पर; वह आपके चोर होने का,धोखेबाज होने का, नियमहीन होने का सबूत है। अगर वह चौरस्ते पर नहीं है तो आप फिर फिक्र करने वाले नहीं हैं कि आप कार कैसी चला रहे हैं--बाएं जा रहे हैं, कि दाएं जा रहे हैं,कि क्या कर रहे हैं। वह वहां खड़ा है; वह आपके भीतर जो गलत है, उसका प्रतीक है। जिस दिन आदमी बेहतर होगा, उस दिन पुलिसवाले की चौरस्ते पर कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। जिस दिन आदमी सच में ही आदमी होगा, उस दिन अदालतें खो जानी चाहिए।

मगर हम देखते हैं, हमारे राज्यों में अदालत का जो मकान होता है, वह सबसे शानदार होता है। हाईकोर्ट जाकर देखते हैं! पीछे आने वाला आदमी इतिहास में लिखेगा कि कैसे अपराधी लोग रहे होंगे कि अदालतों के इतने-इतने बड़े मकान बनाते थे! अदालतों के इतने-इतने बड़े मकान बनाने की जरूरत क्या है? अदालत कोई गौरव है? कि अदालत कोई कलात्मक कृति है? कि अदालत कोई संस्कृति का प्रतीक है? अदालत तो हमारे भीतर वह जो पशु छिपा है, उसकी जरूरत है।

लेकिन कोई आदमी अगर जस्टिस हो जाए, चीफ जस्टिस हो जाए, तो हम समझते हैं और क्या होने जैसा बचता है! फलां आदमी चीफ जस्टिस हो गया! उसे पता नहीं कि वह दूसरा छोर है हमारे चोरों, अपराधियों, हत्यारों का; और उनके ऊपर ही खड़ा है। जिस दिन वे खो जाएंगे, वह भी खो जाएगा।

कानून बताता है कि लोग अच्छे नहीं हैं। जितना ज्यादा कानून, उतना बुरा समाज! जितनी ज्यादा कानून की जरूरत, उतना बेहूदा समाज! कानून बढ़ते जाते हैं हमारे रोज,तो उससे डर लगता है कि कहीं आदमी और बुरा तो नहीं होता जाता है! क्योंकि कल दस कानून थे तो आज बीस हैं, कल तीस हो जाते हैं। कानून रोज बढ़ते जाते हैं। बढ़ता हुआ कानून बताता है कि आदमी बिगड़ते चले जाते हैं।

लाओत्से कहता है, ताओ से युक्त धार्मिक पुरुष सैनिक से भी बचता है। क्योंकि सैनिक, आदमी के पीछे, अतीत की घटना है;  पशुओं से संघर्ष की घटना है।  सैनिक,आदमी का भविष्य नहीं है, अतीत है। और भविष्य में सैनिक नहीं होना चाहिए।

"सज्जन असैनिक जीवन में वामपक्ष अर्थात शुभ के लक्षण की ओर झुकता है।'

चीन में वामपक्ष को शुभ का लक्षण, प्रतीक माना जाता है।

"सज्जन असैनिक जीवन में वामपक्ष, शुभ के लक्षण की ओर झुकता है; लेकिन युद्ध के मौकों पर वह दक्षिणपक्षअर्थात अशुभ के लक्षण की ओर झुक जाता है।'

आप साधारणतः हत्या पसंद नहीं करते, लेकिन युद्ध के समय में पसंद करते हैं। पसंद ही नहीं करते, जो जितनी ज्यादा हत्या कर आए उसे उतना सम्मानित करते हैं। हत्यारा आदृत हो जाता है। साधारण जीवन में आप हत्या के विरोधी हैं; युद्ध के समय आपका सारा रुख बदल जाता है। आप और ही तरह के आदमी हो जाते हैं।

तो लाओत्से कहता है कि शांत जीवन में सज्जन आदमी शुभ की तरफ होता है, अशांत और युद्ध के क्षणों में वह भी अशुभ की ओर झुक जाता है। अशुभ तो अशुभ रहते ही हैं, युद्ध के समय में जो सज्जन थे वे भी अशुभ की ओर झुक जाते हैं।

इसलिए युद्ध का समय मनुष्य के जीवन में, समाज के जीवन में, धर्म की दृष्टि से पतन का समय है। युद्ध के समय में बहुत सी बुराइयां सहज स्वीकृत हो जाती हैं, जिनका हम कभी वैसे खयाल भी नहीं करते। पिछले महायुद्ध में ऐसा हुआ कि जब हजारों सैनिक अपने घरों को छोड़ कर युद्ध पर गए। तो जैसा भारत में हुआ कि स्टेशन-स्टेशन पर हम सैनिक का स्वागत करने लगे, फूलमालाएं पहनाने लगे, मिठाइयां भेंट करने लगे, कि स्वेटर और कपड़े और ऊनी कपड़े भेंट करने लगे--कुछ हम भेंट करने गए। लेकिन आपको शायद पता न हो कि पिछले महायुद्ध में स्त्रियों ने, लड़कियों ने सैनिकों को जाकर स्टेशनों पर अपने शरीर भी भेंट किए। एक लिहाज से तो अगर भेंट ही करना हो, तो क्या स्वेटर भेंट कर रहे हैं! स्त्रियों ने अपने शरीर भी भेंट किए; क्योंकि जो मरने-मारने जा रहा है, उसे सब कुछ दिया जाए। जो स्त्रियां कभी सोच भी नहीं सकती थीं--क्योंकि वे साधारण स्त्रियां थीं, कोई वेश्याएं नहीं थीं--जो सोच भी नहीं सकती थीं किसी पुरुष का संसर्ग,उन्होंने अनजान, अपरिचित लोगों को शरीर दिए। क्या हुआ?

युद्ध सारे मूल्यों को उलटा देता है। जो मूल्य कल तक प्रतिष्ठित थे वे नीचे गिर जाते हैं, और जो अप्रतिष्ठित थे वे ऊपर आ जाते हैं। युद्ध एक उत्पात की स्थिति है। इसलिए जितने ज्यादा युद्ध होते हैं, समाज की गति धर्म की ओर उतनी ही कम हो जाती है।

पिछले पांच हजार साल में पंद्रह हजार युद्ध हुए। हिसाब लगा कर देखा जाए तो ऐसा दिन खोजना मुश्किल है,जब जमीन पर कहीं न कहीं युद्ध न हो रहा हो। युद्ध हो ही रहा है, युद्ध चल ही रहा है। कहीं न कहीं हम आदमी को मार रहे हैं, और मर रहे हैं। आदमी मरने और मारने के लिए है?

ओशो,
ताओ उपनिषाद (भाग--3) प्रवचन--62

Thursday, 1 June 2017

कोर्ट के CCTV कैमरा फुटेज के बारे में,.... महत्वपूर्ण जानकारी.................

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

आदरणीय देशवासियों,......

देश के लगभग हर कोर्ट में  CCTV कैमरा लगाये गए हैं . ये एक वैज्ञानिक दृश्य सबूत ( Scientific Visual  Evidence ) के रूप में एक महत्वपूर्ण सबूत है,   जिसमे किसी गवाह की जरुरत नहीं होती  .निम्न  परिस्थितियों में यह आप की बड़ी मदद कर सकता है :---

---  आप कोर्ट काम्प्लेक्स में हैं,  और कोई लड़ाई झगडा हो जाये, तो ये सबूत,  दोषी को  पहचानने में मदद करता  है.

--- आप को कोई जज गलत और  गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार कर ले . जैसे कि – आप को 11 : 00 AM पर जज ने हिरासत  में दिखा दिया और आप उस समय कोर्ट में थे.   लेकिन आपको हिससत में लिखे गए समय के  आलावा,   किसी और समय पर गिरफ्तार  किया गया .....???  फर्जीवाड़ा करने वाले जज अक्सर, ये गलती कर जाते    हैं .

अगर कोई जज Anti-time और   Anti-Date आर्डर लिखे तो ये दंडनीय अपराध की श्रेणी   में आता है . उस केस में CCTV कैमरा फुटेज अहम् सबूत हो सकती है. 

निचली अदालतों में ये गड़बड़ी  बड़ी आम बात है .

और  CCTV कैमरा फुटेज सिस्टम में 30 दिनों तक  सुरक्षित रहती है. और इस दौरान कभी भी सुरक्षित  / Preserve की जा सकती है .
 ऐसी दशा में आप के परिवार के सदस्य CCTV कैमरा  फुटेज को,   उस कोर्ट के सबसे बड़े जज को,  एक लैटर देकर Preserve करवा सकते हैं ( Preserve  करवाने के  कोई चार्जेज नहीं लगते ) और RTIके माध्यम से भी   CCTV कैमरा फुटेज ले सकते हैं............ 
CCTV कैमरा फुटेज,आप को अपनी सच्चाई सिद्ध करने में बड़ी मदद कर सकता है . 

और अगर   ये लोग CCTVकैमरा फुटेज को नष्ट कर देते हैं तो,.......... उस सम्बंधित आधिकारी/ जज के खिलाफ सबूतों कोनष्ट करने और षडयंत्र रचने के एवज में कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं.



Appeal.................
May 16, 2014 at 2:20am
आदरणीय देशवासिओ,
फेसबुक पर मुझे ब्लॉक कर दिए जाने के कारण मैं आपकी Friend Request स्वीकार भी नहीं कर पा रहा हूँ . इसलिए आप से विनती है की हमसे जुड़ने के किये Follow करें . Groups से जुड़ने के लिए Request स्वीकार की जा सकती हैं. अलग-2 विषयो की अधिक जानकारी के लिए हमारे ब्लॉग, ग्रुप्स और पेज को पढ़ें .आप से निवेदन है कि ग्रुप्स
में उनकी केटेगरी के अनुसार ही पोस्ट करेंगे तो उनकी उपयोगिता अधिक बनी रहेगी .
ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें -----https://www.facebook.com/notes/manojj-vishwakarma/ये-ग्रुप्स-आप-लोगो-कि-सेवा-करते-रहेंगे-हमारी-कोशिश-इनको-और-बेहतर-बनाना-है-/540484442721858
   

आपका  
        भवदीय
Manojj Kr. Vishwakarma... न्याय--- पुरुष
Social Activist, RTI Activist & Scientist
A Responsible Citizen of Nation.......
09253323118./ 09910597896
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Misuse of Contempt of Court Proceedings by Judges..........of Narnaul...........& High Court, Chandigarh

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

Must  Read............ You may need this knowledge in Future ............ 

https://www.facebook.com/notes/manojj-vishwakarma/misuse-of-contempt-of-court-proceedings-by-judgesof-narnaul-high-court-chandigar/569698029800499/

लगता है,........ केन्द्रीय सूचना आयोग भी, भ्रष्टाचार की चपेट में आ गया...............!!!

आईये.... .....!!! भारत बदलें .... Let's Change India ....

आदरणीय देशवासियों,

दिनांक- 20/03/2015 को विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यमसे मेरी RTI Dated--25/12/2013, 26/12/2013   की  केन्द्रीय सुचना आयोग में  2nd Appeal थी.      मैं  हैरान हूँ कि -- अभी तक न तो उस आर्डर को,   वेबसाइट पर  update किया गया है ,  औरन ही उसकी कॉपी मुझे मिली है .

क्या था मुद्दा............???

मैंने RTI के माध्यम से राष्ट्रिय महिला आयोग से पूछा था कि – आज तक उन्होंने शारीरिक और मानसिक रूप से  विकलांग औरतों के लिए क्या किया है ..............???
दूसरी RTI प्रधान मंत्री  कार्यालय को भेजी थी, वो भी महिला सशक्तिकरण के दावो से सम्बंधित थी, उसका जबाब भी  नहीं दिया गया था . 

इसलिए  2nd Appeal का  रास्ता चुना.  
इसका मतलब क्या समझा जाये..................??? 

https://www.facebook.com/notes/manojj-vishwakarma/%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%86-%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A4%BE/574588339311468/